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जून, २०१२ पासूनच्या पोेस्ट दाखवत आहे
रास्तेसे चलते हुए मुझे एक आदमी मिला, वह पूरी तरह से जन्जिरोसे जकड़ा हुआ था। वह रस्तेका हर एक पत्थर उठता था और जन्जिरोको लगता था। मैंने उसे पूछा की तुम यह क्या कर रहे हो? वह बोला मैं परिस ढूंढ़ रहा हु। जिस दिन मुझे परिस मिलेगा, मैं इतनी सारी जन्जिरोंका सोना करके पूरी जिंदगी आरामसे रहूँगा । इतनी बात करके वह फिरसे परिस खोजते हुए आगे निकल पड़ा। कई दिनों बाद वही आदमी मुझे फिरसे मिला, इसबार उसके सभी जन्जिरोंका सोना हुवा था और उसके हाथ में एक लोहे का टुकड़ा था । मैंने उसे पुछा की अब तो सभी जन्जिरोंका सोना हुवा है अभी क्या ढूंढ़ रहे हो? वह रोता हुए बोला की उसे परिस तो मिला था पर पत्थर जंजीर को लगाकर फेकने की आदत इतनी हो गयी थी की उसने वह परिस भी कही फेक दिया था। अभी वही परिस फिरसे ढूंढ़ रहा हु। कुछ इसी तरह मनुष्य की जिंदगी गुजर रही है।